खैर बात तो खत्म हो गई, पर उस कर्मचारी के 37 साल
मुझे 37 मिनट तक सोचने के लिए मजबूर करते रहे। 37 से सोचते सोचते मैं 97 तक कब पहुच गया मुझे मालूम ही नही चला। पर 97 के आगे
सोचने की न तो मेरी बुद्धि काम आई और न ही मेरे मन मे कोई विचार आया।
जिंदगी मे तो हमेशा ही कुछ न कुछ पहली बार तो जरूर होता है।
ज़िदगी के काल चक्र के पहिये पे तो हर समय ही पहली बार है। जो मै कल था वो मै खुद आज
नही हू। फिर स्वाभिमान किस पे करू, कल पे या जो मै अभी हू उस पर , या फिर कल जो मै हो जाऊंगा उस पर। अज्ञात वर्ष लंबी जिंदगी मे पहली बार ही
कभी साँसे भी साथ छोड़ जायेंगी, फिर कौन सा स्वाभिमान मुझे आहत
करेगा॥
इतना कुछ सोच के अंतत: जब मै अपने अधीनस्थ कर्मचारी को समझाने
के लिए उठा ही था, तभी एक ख्याल ने मुझे वापस अपनी ओर खीच लिया कि आखिर इतनी समझ
तो मेरे उस कर्मचारी को भी होगी, क्यू कि उसका अनुभव और उम्र
तो मुझसे भी कही ज्यादा है, मै कौन होता हू उसे समझाने वाला.....॥स्वतह॥

क्या हुआ था कर्मचारी के साथ पर्सनली शेयर कर सकते हो बाय द वे लिखते अच्छा हो चाहो तो कोई नोबेल भी लिख सकते हो ऐसा लिखावट से समझ में आया
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Deleteअतिसुंदर लेख। विचारणीय।
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteGood note.
ReplyDeleteSad story.
Poor Guy!
Nice one. Keep writing.
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteYour gut feeling is outstanding.read you first time.Bravo!for this real philosphy.
ReplyDeleteThnx chacha
DeleteAapki lekhni Uttam hai... Keep it up...
ReplyDeleteThnx
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