Wednesday, 8 March 2017

बस एक सोच का फर्क है वरना आप और मै एक ही है

आज सुबह जब आफिस पहुचा तो देखा के मेरे  दफ्तर मे कार्यरत एक कर्मचारी बड़े ही उखड़े मूड मे बैठा है। मैंने अपने चुटकी भरे अंदाज मे पूंछा “क्या हुया महोदय आज कुछ ज्यादा ही प्रसन्न नजर आ रहे है” । “37 साल की नौकरी मे आज तक ऐसा नही हुआ” भड़के हुये अंदाज मे मुझे जवाब मिला। मै आगे कुछ जानने की कोशिश करता या कुछ बोलता उसके पहले ही मन से एक रुकने की आवाज आई। सैतीस साल??? अभी तो मै भी नही हुया था सैतीस साल का। नि:संदेह कर्मचारी भले ही मुझसे नीचे पद पर हो परंतु उसका अनुभव और उम्र मुझसे कही ज्यादा है। अभी मै कैसे उसकी समस्या का समाधान कर सकूँगा। यही सोचते सोचते मैं उससे पूंछ ही बैठा “ आखिर हुआ क्या है”। जवाब सुन के ज्ञात हुया की उस कर्मचारी के स्वाभिमान को धक्का मिला है।
खैर बात तो खत्म हो गई, पर उस कर्मचारी के 37 साल मुझे 37 मिनट तक सोचने के लिए मजबूर करते रहे। 37 से सोचते सोचते मैं 97 तक कब पहुच गया मुझे मालूम ही नही चला। पर 97 के आगे सोचने की न तो मेरी बुद्धि काम आई और न ही मेरे मन मे कोई विचार आया।
जिंदगी मे तो हमेशा ही कुछ न कुछ पहली बार तो जरूर होता है। ज़िदगी के काल चक्र के पहिये पे तो हर समय ही पहली बार है। जो मै कल था वो मै खुद आज नही हू। फिर स्वाभिमान किस पे करू, कल पे या जो मै अभी हू उस पर , या फिर कल जो मै हो जाऊंगा उस पर। अज्ञात वर्ष लंबी जिंदगी मे पहली बार ही कभी साँसे भी साथ छोड़ जायेंगी, फिर कौन सा स्वाभिमान मुझे आहत करेगा॥

इतना कुछ सोच के अंतत: जब मै अपने अधीनस्थ कर्मचारी को समझाने के लिए उठा ही था, तभी एक ख्याल ने मुझे वापस अपनी ओर खीच लिया कि आखिर इतनी समझ तो मेरे उस कर्मचारी को भी होगी, क्यू कि उसका अनुभव और उम्र तो मुझसे भी कही ज्यादा है, मै कौन होता हू उसे समझाने वाला.....॥स्वतह॥     

11 comments:

  1. क्या हुआ था कर्मचारी के साथ पर्सनली शेयर कर सकते हो बाय द वे लिखते अच्छा हो चाहो तो कोई नोबेल भी लिख सकते हो ऐसा लिखावट से समझ में आया

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  2. अतिसुंदर लेख। विचारणीय।

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  3. Good note.
    Sad story.
    Poor Guy!

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  4. Your gut feeling is outstanding.read you first time.Bravo!for this real philosphy.

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  5. Aapki lekhni Uttam hai... Keep it up...

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